पहले कैप्टन को निपटाया, फिर चन्नी-सिद्धू को भिड़ाया… ‘परिवार’ के लिए पंजाब में पार्टी की कुर्बानी: कॉन्ग्रेस की पॉलिटिक्स यह भी

पाँच राज्यों के चुनावी नतीजों में कॉन्ग्रेस के लिए सबसे बुरी खबर पंजाब से आई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश भर में भाजपा की लहर के बीच कॉन्ग्रेस ने जो राज्य बचाए रखे थे, उनमें से एक मजबूत गढ़ पंजाब था, लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह के अलग हो जाने का कॉन्ग्रेस को यहाँ साफ तौर पर नुकसान होता दिख रहा है।

हालाँकि, इसकी नींव अगस्त 2020 में ही उस वक्त रखी जा चुकी थी, जब बिना किसी स्थायी अध्यक्ष के चल रही पार्टी से असंतुष्ट 23 वरिष्ठ नेताओं ने G-23 ग्रुप बनाया था। 23 वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं ने अंतरिम पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी को एक पत्र लिखकर तत्काल और सक्रिय नेतृत्व, संगठनात्मक परिवर्तन का अनुरोध किया था। गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, शशि थरूर, मनीष तिवारी, आनंद शर्मा आदि इस ग्रुप के प्रमुख सदस्य थे। अटकलें थी कि अमरिंदर सिंह इसके प्रमुख चेहरा थे। इसको लेकर वह कॉन्ग्रेस के निशाने पर थे।

पार्टी को किसी तरह अमरिंदर सिंह को किनारे लगाना था और अपने गाँधी परिवार की साख को बचाना था। इसके लिए कॉन्ग्रेस ने सहारा लिया नवजोत सिंह सिद्धू का। अमरिंदर सिंह पर आरोप लगा कि वह पंजाब में चल रहे कथित किसान आंदोलन के हितैषी थे, उन्होंने ही इसे हवा दी थी। हालाँकि, इस आरोप की वजह से पंजाब में उनका समर्थन एक बार फिर बढ़ता दिखाई दिया, जो कि कॉन्ग्रेस किसी भी हाल में नहीं चाहती थी।

इसलिए पंजाब में कॉन्ग्रेस के ‘ओल्डगार्ड’ कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ पार्टी आलाकमान यानी गाँधी परिवार ने ही विद्रोह को हवा दी। नवजोत सिंह सिद्धू के सहारे कॉन्ग्रेस शीर्ष नेतृत्व कैप्टन अमरिंदर सिंह को पार्टी से बाहर निकालने में सफल हो गया। लेकिन, अमरिंदर सिंह के जाते ही पंजाब में कॉन्ग्रेस दर्जनों गुटों में बँट गई। सुनील जाखड़ से लेकर नवजोत सिंह सिद्धू तक हर कोई खुद को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए हाथ-पैर मारने लगा।

इस बीच कॉन्ग्रेस आलाकमान ने चरणजीत सिंह चन्नी को पहला दलित सीएम बनाने का दाँव खेला। लेकिन, गाँधी परिवार के इस दाँव से सिद्धू खफा हो गए। ऐसा मालूम होता है कि भाई-बहन (राहुल गाँधी-प्रियंका गाँधी) की लीडरशिप ने पहले तो सिद्धू की हर बात मानी लेकिन आखिर में रणनीति बदल दी और सिद्धू का तो एक ही मिशन था- गाँधी परिवार ने मुख्यमंत्री या सीएम फेस नहीं बनाया तो सब छोड़ कर घर बैठ गए और पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इतना ही नहीं, धुरी में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने मंच पर भाषण देने से मना कर दिया।

प्रियंका गाँधी कॉन्ग्रेस कैंडिडेट बलवीर सिंह गोल्डी के समर्थन में प्रचार करने धुरी गईं थी। मंच पर प्रियंका गाँधी वाड्रा, नवजोत सिद्धू और सीएम चरणजीत सिंह चन्नी समेत कई और नेता मौजूद थे। जब नवजोत सिंह सिद्धू का नाम पुकारा तो उन्होंने हाथ जोड़ लिए। सिद्धू ने प्रियंका गाँधी की तरफ इशारा करते हुए कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया और चरणजीत चन्नी की ओर इशारा किया कि वे अगले वक्ता होंगे।

एक समय में भारत के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दल का ये हाल हो गया जब ना वो कोई आत्ममंथन करने की स्थिति में है और ना ही वो कोई ठोस फैसला लेने की हालत में ही नज़र आ रही है। एक लंबे अरसे से कॉन्ग्रेस नेतृत्व के सवाल पर अंदरूनी खींचतान से रूबरू होती रही है। इसलिए आज पार्टी का यह हाल है- न खाता न बही, जो राहुल कहें वही सही।

सुदृढ़ और उर्जावान नेतृत्व की कमी, खेमेबाजी और क्षमता की बजाय चाटुकारिता को मिल रहे प्रश्रय से जूझ रही कॉन्ग्रेस की हालत कुछ ऐसी हो गई है एक दीवार को सँभालने की कोशिश होती है तो दूसरी भड़भड़ाने लगती है। पार्टी के अंदर यही तय नहीं हो पाता कि परिवार बचाया जाए या पार्टी। या यूँ कहा जाए कि अब तक पार्टी नेता यह नहीं समझ पा रहे हैं कि परिवार और पार्टी अलग अलग है और नेता कार्यकर्ता पार्टी के लिए हैं, परिवार के लिए नहीं।

अब अगर इस पूरे प्रकरण पर नजर डाला जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर से पार्टी के ऊपर परिवार को रखा। पार्टी के लिए जो भी नेता चुनौती बने, कॉन्ग्रेस ने बड़ी ही चालाकी से उन्हें आपस में निपटा कर अपने परिवार को बचा लिया। कॉन्ग्रेस ने वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर अपने परिवार को बचाने की नैया को पार लगा लिया।

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