कर्नाटक चुनाव:जमीनी हालात कर रहे हैं कमल खिलने का इशारा

अगर हम सियासी पंडितों की मानें, तो कर्नाटक के विधानसभा चुनाव का नतीजा त्रिशंकु असेंबली के रूप में आएगा. इस भविष्यवाणी के पीछे ठोस तर्क है. जिसे भी चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी की जरा भी समझ है, उसके लिए ये अनुमान भरोसे के लायक लग रहा है.
अगर आपको इस पर जरा भी शक है, तो तथ्यों पर गौर फरमाएं. चलिए हम कर्नाटक को चार हिस्सों में बांटकर मतदाताओं के बर्ताव की समीक्षा करते हैं. मसलन, उत्तर कर्नाटक, जहां राज्य के कुल 30 में से 14 जिले हैं और 224 में से 104 विधानसभा सीटें हैं, उसे लिंगायत बहुल इलाका माना जाता है. उत्तर कर्नाटक को बीजेपी का मजबूत गढ़ कहा जाता है. इस इलाके की कई सीटों पर लिंगायतों की आबादी काफी ज्यादा है. इसी वजह से ये इलाका बीजेपी का अभेद्य गढ़ लगता है.
वहीं तटीय कर्नाटक, जहां 33 सीटें हैं और लिंगायतों की आबादी कम है, वहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला दिखता है. बेंगलुरु, जो राज्य का कॉस्मोपॉलिटन शहर माना जाता है, वहां पर 28 सीटें हैं. इनमें से 18 शहरी विधानसभा क्षेत्र हैं. यहां पर गैर कन्नड़ मतदाता ज्यादा तादाद में हैं. इसी वजह से इसे हिंदुत्व का गढ़ कहा जाता है. वहीं मैसूर इलाके में 59 सीटें हैं. यहां पर कर्नाटक के दूसरे मजबूत सियासी समुदाय वोक्कालिगा की संख्या काफी है. वोक्कालिगा समुदाय आम तौर पर जनता दल सेक्यूलर के साथ खड़ा होता आया है. इसकी वजह हैं पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा और उनके बेटे एच डी कुमारस्वामी. हालांकि कांग्रेस और बीजेपी में भी कई कद्दावर वोक्कालिगा नेता हैं.
साफ है कि चुनाव के नतीजों का आकलन जातियों के पिछले वोटिंग पैटर्न के आधार पर किया जा रहा है. जो समुदाय पिछले लंबे वक्त से लगातार एक पार्टी को वोट दे रहे हैं, उसी स्टीरियोटाइप को आधार बनाकर, सियासी पंडित इस बार के चुनाव के नतीजों का अनुमान लगा रहे हैं. जबकि ऐसे अनुमान कई बार गलत साबित हो चुके है. लेकिन इसी तरीके से चुनाव की पेचीदगियों को आसान तरीके से पेश किया जाता रहा है. इसका ये नतीजा होता है कि मामला और भी पेचीदा हो जाता है.
क्या मतदाता ठीक उसी तरह सोचता है, जिस पेचीदगी से हम उसके बर्ताव की समीक्षा करते हैं? हकीकत ये है कि भले ही इस चुनाव के नतीजों को लेकर सियासी समीक्षक जो भी अनुमान लगा रहे हों, नतीजे उतने पेचीदा नहीं होंगे. ऐसा लग रहा है कि इस बार वोटर किसी एक दल को बहुमत देंगे. ये ऐसा नतीजा होगा, जो देशव्यापी ट्रेंड के हिसाब से ही होगा.

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