‘सरफरोशी की तमन्ना’ और ‘रंग दे बसंती चोला’ लिखकर अमर हो गए क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल,

आज रामप्रसाद बिस्मिल का जन्मदिन है. उनका नाम पहली बार काकोरी केस में पहली बार सामने आया था. रामप्रसाद का जन्म 11 जून 1897 में को हुआ था. 10 क्रांतिकारियों ने मिलकर लखनऊ के पास काकोरी में एक ट्रेन को लूट लिया था. इस ट्रेन में पैसा और कुछ जर्मन पिस्तौलें थीं जिन्हें सभी ने मिलकर लूटा था. ये सब अंग्रेजी सेना के लिए ले जाया जा रहा था. रामप्रसाद बिस्मिल को इस केस में जब पकड़ा गया तो उन्होंने सरंडर कर दिया था. जिसके बाद उन्हें पता लगा था की उन्हें अब फांसी दी जाएगी 19 दिसंबर 1927 को उन्हें गोरखपुर की जेल में फांसी दी गई थी. लेकिन कहते हैं, न महज शरीर की मौत होती है लेकिन लब से निकलें शेर और बेहतरीन नगमों ने आज तक रामप्रसाद बिस्मिल को भारत में जिंदा रखा है. उनका लिखा हुआ गीत ”सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” कौन नहीं जानता होगा और किसने नहीं सुना होगा. आज उनके जन्मदिन के मौके पर हम उनकी कहानी को फिर याद करेंगे. और जानेंगे कैसे इस महान क्रांतिकारी ने अपने लेखनी से भारत के लोगों में क्रांति लाने का प्रयास किया था.

द लेजेंड ऑफ भागत सिंह
रामप्रसाद बिस्मिल का गीत ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ आज भी स्वतंत्रा दिवस और गणतंत्र दिवस खूब शान से बजाया जाता है. इस गाने को कई फिल्मों में इस्तेमाल किया गया है. इतना ही नहीं भगत सिंह के जीवन पर बनी फिल्म ‘द लेजेंड ऑफ भागत सिंह’ फिल्म में भी इस गाने को एक अहम जगह दी गई है. इस फिल्म में भगत सिंह का किरदार अजय देवगन ने निभाया है.

अनुराग कश्यप की गुलाल
2009 में रिलीज हुई अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गुलाल’ में भी हमने इस गाने को सुना था. इस फिल्म में पियूष मिश्रा हारमोनियम लेकर सरफरोशी की तमन्ना गाते हुए नजर आते हैं. लेकिन इस गाने की अंतिम पंकितियों में वो बिस्मिल को वो आज के दौर से रूबरू करवाते हुए कहते हैं.

औ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिंदोस्ता,
देखते की मुल्क सारा क्या टशन, क्या थ्रिल में है.

बिस्मिल ने भले ही ये नगमें अपने अंतिम दिनों में लिखें हों लेकिन उनकी कलम आज भी हमारे साथ है. उनकी लिखावट में इतनी ताकत थी, कि ये गीत क्रांति के दौर में खूब गाया जाता था. इस गाने को गाते हुए पहले उन्होंने फांसी को गले लगाया फिर यही काम भगत सिंह ने भी किया. इस गाने की एक लाइन है जो कुछ इस प्रकार है.

देश हित पैदा हुए हैं,
देश पर मर जाएंगे.
मरते मरते देश को,
जिंदा मगर कर जाएंगे.

वाकई इस गाने ने बॉलीवुड में एक अलग रेखा खिंची है. जिस वजह से रामप्रसाद बिस्मिल को कभी भुलाया नहीं जा सकता. बिस्मिल की कहानी कोई आम कहानी नहीं थी, जेल में फांसी से पहले उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी थी. इसमें उन्होंने कहा था, भारत में तब तक कोई भी आंदोलन पूरी तरह से जीता नहीं जा सकता जब तक भारत की जनता शिक्षित नहीं हो जाती. हमें शिक्षित होना होगा, वही हमारी सबसे बड़ी और पहली आजादी होगी. बिस्मिल एक हिंदू परिवार से अपना नाता रखते थे, जहां हिंदी उनके पिता ने उन्हें सिखाई थी और उर्दू उन्होंने एक मौलवी से सीखी थी. बचपन में बिस्मिल बेहद बिगड़े लड़के थे, वो एक दिन में 50 से 60 सिगरेट पी जाया करते थे, लेकिन आर्य समाज से जुड़ने के बाद उन्होंने ये सारी आदतों को अलविदा कह दिया था.

”मेरा रंग दे बसंती चोला”, भी क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की उपज थी, लखनऊ जेल में काकोरी षड्यन्त्र के सभी अभियुक्त कैद थे. उस दौरान बसंत पंचमी के एक दिन पहले उनके साथियों ने उन्हें कुछ लिखने के लिए कहा जिसे वो अगले दिन सभी के साथ मिलकर गा सके और फिर इस गाने की आवाज से पूरा जेल परिसर गूंज उठा.

वहीं ‘रंग दे बसंती’ नाम की पूरी फिल्म भी बन चुकी है, जिसमें ऐसे ही क्रांतिकारी बच्चों की कहानी को दिखा गया है. आपको बता दें, ये फिल्म 2006 में रिलीज हुई थी, इस फिल्म में हमें आमिर खान, शर्मन जोशी, सोहा अली खान और आर माधवन मुख्य भूमिका में नजर आए थे.

बिस्मिल के सबसे अजीज दोस्त अशफाकुल्लाह खान थे. उनकी दोस्ती को लेकर कई बार विवाद भी हुए. हिंदू-मुस्लिम को लेकर उस दौरान खूब दंगे हुआ करते थे. लेकिन दोनों ने एक दूसरे के साथ कभी नहीं छोड़ा. बिस्मिल हमेशा हमारे साथ हैं, अपने लेखन, शेर और नगमों के जरिए वो हमेशा हमारे करीब हैं. इस महान क्रांतिकारी को हमारा नमन.

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