मथुरा-वृंदावन की गोशालाओं में नहीं मिला एक भी कोविड संक्रमण का केस, जानिए वजह

क्या गोशालाओं और इंसानी इम्यूनिटी के बीच कोई रिश्ता है? गोशालाओं में काम करने वाले लोगों के पास कोरोना नहीं फटक रहा। ये चौंकाने वाला खुलासा मथुरा-वृंदावन की गोशालाओं में हुए एक शुरूआती सर्वे में हुआ है। जिले की 33 गोशालाओं में कोरोना का न तो एक भी पॉजिटिव केस नहीं आया और न इस महामारी से कोई मृत्यु हुई।

इसी तरह की रिपोर्ट ब्रज क्षेत्र और यूपी के कुछ और जिलों की गोशालाओं से आई है। मथुरा से जुड़े अफसरों का कहना है कि इस दिशा में वैज्ञानिक स्तर पर व्यापक सर्वे और शोध की जरूरत है। इससे कोरोना जैसी महामारी से लड़ने की एक नई राह खुल सकती है।

आयुर्वेद में पंचगव्य माने गए हैं अमृत
हजारों साल पहले लिखे गए आयुर्वेद ग्रंथों में पंचगव्यों यानी गाय का गोबर, गोमूत्र और दुग्ध उत्पादों को अमृत के समान माना गया है। आयुर्वेद इन्हें जैविक औषधीय के विकल्प के रूप में देखता है। आयुर्विज्ञानविदों का दावा है कि पंचगव्य एंटीबायोटिक्स, एंटी-फंगल एजेंट और कैंसर विरोधी दवाओं को भी अधिक प्रभावी बना सकता है।
मथुरा यूपी का अकेला जिला है जहां सबसे ज्यादा करीब 93,000 गोवंशीय पशु हैं। जिले में कोविड की दोनों लहरों में वो प्रकोप नहीं दिखा जो अन्य करीबी जिलों में दिखा। मथुरा के सीडीओ नितिन गौर ने बीते दिनों मुख्य पशु चिकित्साधिकारी (सीवीओ) से मार्च 2020 से अब तक जिले में सभी 33 पंजीकृत गो-आश्रय स्थलों में कार्यरत केयरटेकरों की रिपोर्ट मांगी थी।
सीवीओ ने मुख्य विकास अधिकारी को रिपोर्ट दी है उसके मुताबिक इस दौरान इन गोशालाओं में कार्यरत करीब 218 केयर टेकरों में से न कोई व्यक्ति कोविड संक्रमित हुआ और न ही किसी की इस महामारी में जान गई। इन गोशालाओं में करीब 11 हजार से ज्यादा गोवंश हैं। सबसे बड़ी ऊधर गोशाला में करीब 3 हजार गायें हैं और यहां करीब 40 कार्यकर्ता हैं। इसी तरह मथुरा की राल की गोशाला में कोई ढाई हजार गायें हैं और 70 कर्मी काम करते हैं। जहां किसी को सर्दी जुखाम या बुखार तक नहीं हुआ।

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